Sunday, August 23, 2026

Jalebi बालूशाही

Jalebi बालूशाही….

कोशिशों के रास्ते से ज़राहटकर मिलो,
कभी फ़ुर्सत के चौराहे पे चाय पर मिलो।
कितनी परवाह है तुम्हें अपने नाम की,
आओ, कभी अनाम-अनजान ही मिलो।

भागते-भागते बड़ी दूर निकल आए हो,
रुको, ठहरो… ज़रा ठिठक जाओ।
एक पड़ाव पीछे आओ—कोई छूट गया है,
अरे, कभी ख़ुद से तो मिलो।

आओ, उसी नुक्कड़ पे जलेबी-बालूशाही खाते हैं,
लकड़ी के स्टम्प भूलो, ईंटों की विकेट बनाते हैं।
कुछ अधपके रिश्तों की फिर दावत लगाते हैं,
जो बातों में रह गए थे, उन्हें आज निभाते हैं।

एक दिन कुछ सिक्के कम कमाते हैं,
बहुत हिसाब कर लिया नफ़े-नुक़सान का—
आओ… ज़िंदगी कमाते हैं।

Sunday, July 5, 2026

सुकून से जुनून तक.

चल, आज कुछ और चल लें, 
सोने को है रात पड़ी, देर साँझ कुछ और रच लें।

चल, अब हसरतों को सुकून से चुनते हैं, 
फिर सुकून से जुनून को चुनते हैं |

जो थक गए हैं ख़्वाब, उन्हें बाँहों में भर लें, 
जो टूट गए हैं रास्ते, उन्हें फिर से संवार लें;
ना मंज़िल की जल्दी, ना ठहरने का रंज, 
इन खामोशियों से भी कुछ बातें कर लें |

चल, आज कुछ और चल लें, 
आलस की इस छाँव में, ज़िंदगी की धूप को चुनते हैं,
चल, फिर सुकून से जुनून को चुनते हैं |

Sunday, May 10, 2026

राधेय कर्ण..

जाके रथ हनुमान विराजे, 
जाको  सूत स्वयं जगन्नाथ संभाले,
था वो इन्द्र-बल संग अर्जुन अनुपम |
फिर भी थर्राया कुरुक्षेत्र तमाम, 
जब रण में कर्ण-पार्थ का हुआ संग्राम।

कवच गया, कुंडल भी दान हुए, 
फिर भी उसके प्रण महान हुए; 
मित्र-धर्म का बना अभिमान, 
जो मृत्यु-द्वार से भी न घबराए...

था सूत-पुत्र, 
वो कुंती-पुत्र, 
वो सूर्य-पुत्र महान, 
जिसे हराने को स्वयं नारायण ने, 
रची नीति और विधान।

Thursday, March 19, 2026

सपनों सी शिकारा


इन नहरों की लहरों में,
चाँदनी और दोपहरों में,
...हर शाम बहकती,
हर सुबह सँभलती— शिकारा।

इन्हीं पानी की गलियों में,
झूमते पेड़ों, शाखों और टहनियों से,
सूखे पत्तों से, गिरते फूलों से,
चहकती बेलों से, अधपके फलों से,
ठिठकती, टकराती, चप्पू चलाती — शिकारा।
बरसती मौसमी बौछारों में,
बलखाती, इठलाती — शिकारा।

हैं कहीं सैलानी बेशुमार,
…कहीं चार यार सवार,
झील हो कश्मीर की या अलेप्पी , 
रोज़गार और प्यार शिकारा॥

प्रीत और इंतेज़ार



एक वक्त था- गुज़र गया, बेशकीमती ख़्वाब सरीखा;
 तेरे प्रीत का वो गहरा, पर अनकहा सलीका।
जा रख ले तू सुनहरी सुबह अपनी,
मेरी हिस्से ठहरी ये शाम… 

कोशिशें भी नाकाम शर्मशार, तुझसे बराबरी की;
तू मंजिल, मैं ढलान,
तू साज, मैं सामान, 
तू नज़्म, मैं जुबान;
तू बेहद खास, मैं मामूली आम ।

शिकवा भी कौन करे अब दूरियों का,
अब तेरा इंतज़ार ही मेरा सुकून, मेरा आराम॥

Thursday, January 1, 2026

परिणाम के परे - प्रयास !


पता था न—श्रीराम तो आएँगे,
फिर क्या रावण को रोकने से जटायु पीछे हट जाएँगे?

सोचो—क्यों भला केवट-सी जान,
ख़ुद खेवनहार का खेवैया बन जाएँगे?
क्यों शबरी की तप-प्रतीक्षा की खातिर,
भगवान जूठन खा जाएँगे?

“अंत” ज्ञात होकर भी—
कुंभकर्ण श्रीराम से लड़ जाएँगे;
भाई के लिए मृत्यु स्वीकार—पर विभीषण न बन पाएँगे.!

कभी राजकुल के गुरु की खातिर,
एकलव्य अपना अंगूठा क्यों न्यौछावर कर जाएँगे?
और कृष्ण-अर्जुन के रहते—
अभिमन्यु चक्रव्यूह में उतर जाएँगे?

यह जानते हुए भी कि दाँव खिलाफ़ है—
कर्ण कवच-कुंडल दान क्यों कर जाएँगे?
और बस संजीवनी की ख़ातिर,
हनुमान पूरा पर्वत उठा क्यों लाएँगे?

ऐसा तो हरगिज़ नहीं कि उन्हें परिणाम का अंदाज़ न था—
पर बिन संघर्ष जो नाम बनाए, इतिहास में ऐसा कोई खास न था!

Saturday, December 27, 2025

भोर का नक़ाब


अभी एक पहर की ही बात है, 
जो कुछ देर पहले यहाँ ठहरी थी वो सलोनी श्यामल, लंबी रात थी...

थक कर मूँदी थी आँखें जब, उसे सुकून का आँचल ओढ़ाती, 
वो ग़म जो दिन में दिलों पे दाँत गड़ाए थे, 
अब भर आए थे आँखों में पानी सरीखे ;
जिसे दिन में पलकों पीछे छुपाया था - रात की आग़ोश में सैलाब आज़ाद थी।

फिसलती हुई चाँदनी से छींटकती हुई रोशनी - एक किस्सा सुना रही थी, 
झाँक कर देखा जब मन के ‘झिझक’ ने… 
भोर, रिवायतों की चादर ओढ़े,
चौखट सजा रही थी;
 
अरे.! अभी अभी तो मैं ख़ुद से मिला था - रात के आईने में,
जब अंधेरे का सच हर साये से आजाद था |

मिलन रास ना आई सफेदपोश फरेबी को.!
जो सच से ज़्यादा सलीका - पाबंद थी।
धुंधलकी लालिमा से भोर साजिश रचा रही थी,  
वो जो  दिन का ‘नक़ाब’ था - उस नक़ाब को अमली जामा पहना रही थी, 
मेरे ‘मैं’ की वेदना को डरा रही थी;

या यूँ कह दूँ..! 
कि सैलाबों की आज़ादी पे...
...अंकुश लगा रही थी?

तस्वीर की दुकान


जहाँ दर्द की शक़्ल नहीं होती.., 
                    तस्वीर होती है;
वहाँ एक कलाकार होता है..,
      फिर उसकी दुकान होती है ||

स्वाभिमान

मुफ़लिसी में मुस्कुराना अच्छा,  
मालदारी में मुकर जाना अच्छा;

खुशियों में रहबर शरीक आप हो जाएँगे,
गम के मौसम में गुनगुनाना अच्छा;
आग और राख में फर्क है समर्पण का,  
जो ख़ुदी पे आ जाए — अकड़ जाना अच्छा।

कभी तल्ख़ी में अपनायत मिल जाये,
फिर उसमे मीठा ढूँढ लेना अच्छा;  
और जब ज़ख्म दिल से बोल उठें —  
तो बेशक, बेस्वादी से फ़ाँका अच्छा।

Thursday, November 27, 2025

समझौते का सुकून

 ये मंज़र हम कभी सोच ही न पाए,
कब तू इतना दूर हो गया…

दर्द से समझौता, 
फिर दर्द में सुकून…
अब, जैसे फ़ितूर हो गया ।।

कहीं प्यार अधूरा है,
कहीं ज़िंदगी थकी हुई…
कोई रुकना चाहता है,
कोई हँसना चाहता है…
पर हम सब भाग रहे हैं…

वो दर्द जो दिखाया नहीं जाता,
वो दर्द जो महसूस होता है…
इतनी भीड़ में भी, जाने
ये ग़म कहाँ गुम होता है…?

ज़रूरत भर का पा लिया है
फिर भी भाग रहे हैं
एक अनकही ख़्वाहिश के लिए,
किसी अनजानी फ़रमाइश के लिए…

Wednesday, October 22, 2025

वो रात जो सुबह से बाँटी नहीं

 ख़्वाबों की स्याही थी, आँखों का कलम,
देखता रह गया ख़ामोश तुझे,
पर आवाज़ तुझे… मैंने दी ही नहीं; 
 
इज़हार-ए-बयान का सवाल कहाँ,
इस इश्क़ को तेरी उम्मीद, मैंने कभी दी ही नहीं।

इल्म था अर्श के सितारे का,
मुझे मेरी ज़मीन पर;
तुझसे मिलने की ख़्वाहिश — ‘तुझसे’ तो मैंने की भी नहीं।

अब तारे भी हो चले हैं रुख़्सत,
क्या मैं चाँदनी का हाथ थाम लूँ..?
तेरी यादों में घुल जाऊँ…
या अपनी साँसों से ये रात माँग लूँ..?

लो मूँद ली अब आँखें इस ख़याल से,
जो रात इतनी हसीं थी — उसे सुबह से क्यों बाँट लूँ.!

Sunday, September 14, 2025

धूप - रजाई

वक़्त की रज़ाई से कुछ धागे उधेड़ दो,
यादों की धूप अब सन्दली-सी ठहरने लगी है...
उसे खुलकर बरस जाने दो।
हर सूत में एक दास्तान है, हर गाँठ कोई पहचान है;
...अनचाहे हादसों की सरगम, कोई मुस्कुराते किस्सों की जान है।
सिलवटें हैं बिखरी फ़ैली हुई...
कुछ नादानियों की, कुछ अमीट—अधूरे इंतज़ारों की।
दिल कहता है— उड़ जाने दो,
... वक़्त कहता है ठहर जाने दो.!

Friday, September 5, 2025

बचपन

जिस मोड़ पर तू मुझसे छूटा,
वहाँ खड़ी मेरी फ़रेब जवानी थी…
पर जब तूने मुझे छोड़ा—
क्या तेरी मजबूरी थी?
तेरी क्या कहानी थी?

चल, जो बीत गई सो बात गई…
बस उस वक़्त का हिसाब करा दे।
एक बरस लौट के आ,
ज़िन्दगी फिर से दिलबाग़ बना दे।
रह गई हैं अधूरी बचपन की कुछ यादें, 
आ, उन्हें पूरी करा दे—

एक बार फिर गर्मी की छुट्टी दिला दे,
दोस्तों से ध्रुव और राज की कॉमिक्स दिला दे,
एक बार ही सही,
Ludo में दीदी से जीता दे।
दादी के हाथ से लड्डू बनवा दे,
नानी की गली में कुल्फ़ी वाले को बुला दे,
मम्मी से फ्रीज में Mango ice cream बनवा दे,
पापा की Vespa पे आगे खड़ा हूँ-
-चल, थोड़ा शहर घुमा दे।


मेरे मासूम से बचपन में, ‘वक़्त’ ने 'उम्र' को जोड़ दिया…
इतनी भी क्या नाराज़गी तेरी—ए बचपन!
तूने मुड़ कर देखना ही छोड़ दिया…!

Saturday, August 2, 2025

अजीत-यश

पता था ना श्री राम तो आयेंगे,
फिर क्या रावण को रोकने से जटायु पीछे हट जायेंगे?

क्यों भला केवट सी जान, ख़ुद खेवनहार के खेवैया बन जाएँगे?
फिर एक संजीवनी की ख़ातिर, हनुमान पूरा सुषेण उड़ा ले जायेंगे।

कभी राजकुल के गुरु की खातिर, एकलव्य अंगूठा न्यूँछावर कर जाएँगे!
और कहीं अर्जुन के रहते, क्यों अभिमन्यु ‘चक्रव्यूह’ भेदने जाएँगे ?
कृष्ण सुदामा की दोस्ती सरस ज्ञात - ख्यात है, 
दुर्योधन - कर्ण की कैसे भूल जाएँगे!?

स्थापित है युगों से हार से पृथक, सदा प्रयास की यशगाथा है;
सच और सही से अक्षुण्ण ‘साथ’ भी पूजे जाएँगे ।

Sunday, July 27, 2025

बचपन दोबारा!

 मेरे हद में किस्से थोड़े बे-हद हैं..
खिलौनों में खिलता हूँ, मैं मेलों में भटकता हूँ;
सूरज से भीगता हूँ, मैं बारिशों में चमकता हूँ ॥
बेपरवाह हो सकता हूँ, बदमिजाज नहीं;
कुछ रह जाती हैं ख़्वाहिशें अधूरी…
मैं बस अपने हिस्से का बचपन जी रहा हूँ .! 

 


Saturday, July 5, 2025

अनाम


तमाशा ग़ैर जरूरी था, इस नाम अनाम का;   
परवाह नहीं था,
मैं तेरी आशिक़ी, या तेरे आशिक़ का रक़ीब.!  

तू झेलम की धार तर्रार, मैं संग शिकारा,
देख तुझे, पर पा ना सका,
मैं इक पल जीता, मैं हर पल हारा ।

है जितनी दूरी अपनी, उतना तेरा इश्क़ क़रीब;
जे तू मेरी इबादत, ते मैं तेरा रहबीर ।

तू ही तो आप ‘तू’, है तू ही तस्वीर;
मेरे हर गीत में बस तू ही शुमार,
तू कभी शाह बुल्ले, कभी तू ‘आप’ कबीर।

Saturday, June 7, 2025

दूरियाँ ..

पैगाम कहां इश्क़ से बे-ताहरूफ होता है,
और अंजाम कहाँ सभी को माशूक़ होता है?
बहुत हुआ तो हुआ यूं कि...
कहीं एतबार हो जाता है, कभी एहसास रह जाता है।

किस्सा है इम्तहान का मेरे ऊँस का अक़ीदत से,
तब हसरतों की शाम में इत्तेफाक़ ने ख़ुद को,
                               ‘ख़ुद’ से मिलाया था,
तेरी मेरी मोहब्बत का अश्क़ भी हमारा था, 
                          …अश्फ़ाक भी हमारा था।

.. अब सोचता हूं तुझे तो सिमटती है चांदनी मेरी,
तुझसे दूरियों में शाम.., शमशान सा नजर आता है।

Friday, March 21, 2025

सुकून

कल ज़िंदगी से कुछ पल सुकून के उधार माँग लिया,
कभी बिछड़ चुके रिश्तों से अपना एक दोस्त भी साथ माँग लिया।

वो कुछ पल मेरे बयाने में एक शाम की थी,
तब अलसाये चाँद से गोधूलि को गुजरते पलों में एक जाम माँग लिया।
ये उन यादों, तक़रीरों, बंदिशों,
      … अल्फ़ाज़ों, शब्दों, लम्हों…
 में उलझे मेरे जज़्बात की कहानी है,
जहाँ तकल्लुफ़ सी साँसों में बची खुची ज़िंदगी को…
                                   …कभी सुबह माँग लिया…,
                                       कभी शाम माँग लिया।
मोम के धागे सा पिघलता ये वक्त, जब ठंढी बयार सा लगता था,
उन पलों में लिपटी हर कड़वी मीठी बातों को अपनी स्याही में बाँध लिया;

अब सुरूर थोड़ा जाम का… 
                                 … और ज़्यादा यारी का था,
इल्ज़ाम मुझपे लगाया नाजायज़.!
वो ख़िज़ाँ बसंती पलों का अर्श सा…
                  जो बहक ना जाता, तो फिर ग़ैरत-ए-इंसान था।

अब मंदिर मस्जिद तक क्या जाना?
सुकून इन पलों के सजदे में शाश्वत श्वेत है,
जैसे सिमट गए हैं इनमे नूरानी ख़्वाब सारे,
इन आँखों में मैंने वो याद, 
                       वो एहसास,
                        वो तेरा भाव भर लिया ॥

Saturday, February 8, 2025

तेरे मेरे पल


मेरी बैसाखी में तेरा आना और होली में गुनगुनाना,
कभी बिन सावन हरी चुनरियाँ लहराना,
फागुन तीज के झूले, जैसे भादों की फुहारें नहाना..
और पूस में सर्द sweater से आधी हथेली निकाल bye Papa कह जाना;
………….
कैसे बताऊँ मेरी हर साँस में सिमटीं हैं कुछ यादें..
 जो हक़ीक़त थीं कल;
कोई समझे तो समझे मुझे फ़क़ीर,
 मेरी बेशुमार दौलत है तेरे-मेरे वो पल…!