Jalebi बालूशाही….
Sunday, August 23, 2026
Jalebi बालूशाही
Sunday, July 5, 2026
सुकून से जुनून तक.
चल, आज कुछ और चल लें,
सोने को है रात पड़ी, देर साँझ कुछ और रच लें।
चल, अब हसरतों को सुकून से चुनते हैं,
फिर सुकून से जुनून को चुनते हैं |
जो थक गए हैं ख़्वाब, उन्हें बाँहों में भर लें,
जो टूट गए हैं रास्ते, उन्हें फिर से संवार लें;
ना मंज़िल की जल्दी, ना ठहरने का रंज,
इन खामोशियों से भी कुछ बातें कर लें |
चल, आज कुछ और चल लें,
आलस की इस छाँव में, ज़िंदगी की धूप को चुनते हैं,
चल, फिर सुकून से जुनून को चुनते हैं |
Thursday, May 21, 2026
Sunday, May 10, 2026
राधेय कर्ण..
जाके रथ हनुमान विराजे,
जाको सूत स्वयं जगन्नाथ संभाले,
था वो इन्द्र-बल संग अर्जुन अनुपम |
फिर भी थर्राया कुरुक्षेत्र तमाम,
जब रण में कर्ण-पार्थ का हुआ संग्राम।
कवच गया, कुंडल भी दान हुए,
फिर भी उसके प्रण महान हुए;
मित्र-धर्म का बना अभिमान,
जो मृत्यु-द्वार से भी न घबराए...
था सूत-पुत्र,
वो कुंती-पुत्र,
वो सूर्य-पुत्र महान,
जिसे हराने को स्वयं नारायण ने,
रची नीति और विधान।
Thursday, March 19, 2026
सपनों सी शिकारा
प्रीत और इंतेज़ार
Thursday, January 1, 2026
परिणाम के परे - प्रयास !
फिर क्या रावण को रोकने से जटायु पीछे हट जाएँगे?
सोचो—क्यों भला केवट-सी जान,
ख़ुद खेवनहार का खेवैया बन जाएँगे?
क्यों शबरी की तप-प्रतीक्षा की खातिर,
भगवान जूठन खा जाएँगे?
“अंत” ज्ञात होकर भी—
कुंभकर्ण श्रीराम से लड़ जाएँगे;
भाई के लिए मृत्यु स्वीकार—पर विभीषण न बन पाएँगे.!
कभी राजकुल के गुरु की खातिर,
एकलव्य अपना अंगूठा क्यों न्यौछावर कर जाएँगे?
और कृष्ण-अर्जुन के रहते—
अभिमन्यु चक्रव्यूह में उतर जाएँगे?
यह जानते हुए भी कि दाँव खिलाफ़ है—
कर्ण कवच-कुंडल दान क्यों कर जाएँगे?
और बस संजीवनी की ख़ातिर,
हनुमान पूरा पर्वत उठा क्यों लाएँगे?
ऐसा तो हरगिज़ नहीं कि उन्हें परिणाम का अंदाज़ न था—
पर बिन संघर्ष जो नाम बनाए, इतिहास में ऐसा कोई खास न था!
Saturday, December 27, 2025
भोर का नक़ाब
स्वाभिमान
जो ख़ुदी पे आ जाए — अकड़ जाना अच्छा।
कभी तल्ख़ी में अपनायत मिल जाये,
फिर उसमे मीठा ढूँढ लेना अच्छा;
और जब ज़ख्म दिल से बोल उठें —
तो बेशक, बेस्वादी से फ़ाँका अच्छा।
Thursday, November 27, 2025
समझौते का सुकून
ये मंज़र हम कभी सोच ही न पाए,कब तू इतना दूर हो गया…
दर्द से समझौता, फिर दर्द में सुकून…अब, जैसे फ़ितूर हो गया ।।
कहीं प्यार अधूरा है,कहीं ज़िंदगी थकी हुई…कोई रुकना चाहता है,कोई हँसना चाहता है…पर हम सब भाग रहे हैं…
वो दर्द जो दिखाया नहीं जाता,वो दर्द जो महसूस होता है…इतनी भीड़ में भी, जानेये ग़म कहाँ गुम होता है…?
ज़रूरत भर का पा लिया हैफिर भी भाग रहे हैंएक अनकही ख़्वाहिश के लिए,किसी अनजानी फ़रमाइश के लिए…
Wednesday, October 22, 2025
वो रात जो सुबह से बाँटी नहीं
Sunday, September 14, 2025
धूप - रजाई
यादों की धूप अब सन्दली-सी ठहरने लगी है...
उसे खुलकर बरस जाने दो।
हर सूत में एक दास्तान है, हर गाँठ कोई पहचान है;
...अनचाहे हादसों की सरगम, कोई मुस्कुराते किस्सों की जान है।
सिलवटें हैं बिखरी फ़ैली हुई...
कुछ नादानियों की, कुछ अमीट—अधूरे इंतज़ारों की।
दिल कहता है— उड़ जाने दो,
... वक़्त कहता है ठहर जाने दो.!
Friday, September 5, 2025
बचपन
पर जब तूने मुझे छोड़ा—
क्या तेरी मजबूरी थी?
तेरी क्या कहानी थी?
चल, जो बीत गई सो बात गई…
बस उस वक़्त का हिसाब करा दे।
एक बरस लौट के आ,
ज़िन्दगी फिर से दिलबाग़ बना दे।
रह गई हैं अधूरी बचपन की कुछ यादें, आ, उन्हें पूरी करा दे—
दोस्तों से ध्रुव और राज की कॉमिक्स दिला दे,
एक बार ही सही,
Ludo में दीदी से जीता दे।
नानी की गली में कुल्फ़ी वाले को बुला दे,
मम्मी से फ्रीज में Mango ice cream बनवा दे,
पापा की Vespa पे आगे खड़ा हूँ-
-चल, थोड़ा शहर घुमा दे।
इतनी भी क्या नाराज़गी तेरी—ए बचपन!
तूने मुड़ कर देखना ही छोड़ दिया…!
Saturday, August 2, 2025
अजीत-यश
फिर क्या रावण को रोकने से जटायु पीछे हट जायेंगे?
फिर एक संजीवनी की ख़ातिर, हनुमान पूरा सुषेण उड़ा ले जायेंगे।
और कहीं अर्जुन के रहते, क्यों अभिमन्यु ‘चक्रव्यूह’ भेदने जाएँगे ?
Sunday, July 27, 2025
बचपन दोबारा!
खिलौनों में खिलता हूँ, मैं मेलों में भटकता हूँ;
सूरज से भीगता हूँ, मैं बारिशों में चमकता हूँ ॥
बेपरवाह हो सकता हूँ, बदमिजाज नहीं;
कुछ रह जाती हैं ख़्वाहिशें अधूरी…
मैं बस अपने हिस्से का बचपन जी रहा हूँ .!
Saturday, July 5, 2025
अनाम
परवाह नहीं था,
मैं तेरी आशिक़ी, या तेरे आशिक़ का रक़ीब.!
तू झेलम की धार तर्रार, मैं संग शिकारा,
देख तुझे, पर पा ना सका,
मैं इक पल जीता, मैं हर पल हारा ।
है जितनी दूरी अपनी, उतना तेरा इश्क़ क़रीब;
जे तू मेरी इबादत, ते मैं तेरा रहबीर ।
तू ही तो आप ‘तू’, है तू ही तस्वीर;
मेरे हर गीत में बस तू ही शुमार,
तू कभी शाह बुल्ले, कभी तू ‘आप’ कबीर।
Saturday, June 7, 2025
दूरियाँ ..
और अंजाम कहाँ सभी को माशूक़ होता है?
बहुत हुआ तो हुआ यूं कि...
कहीं एतबार हो जाता है, कभी एहसास रह जाता है।
तब हसरतों की शाम में इत्तेफाक़ ने ख़ुद को,
‘ख़ुद’ से मिलाया था,
तेरी मेरी मोहब्बत का अश्क़ भी हमारा था,
…अश्फ़ाक भी हमारा था।
तुझसे दूरियों में शाम.., शमशान सा नजर आता है।
Friday, March 21, 2025
सुकून
कभी बिछड़ चुके रिश्तों से अपना एक दोस्त भी साथ माँग लिया।
तब अलसाये चाँद से गोधूलि को गुजरते पलों में एक जाम माँग लिया।
ये उन यादों, तक़रीरों, बंदिशों,
… अल्फ़ाज़ों, शब्दों, लम्हों…
जहाँ तकल्लुफ़ सी साँसों में बची खुची ज़िंदगी को…
…कभी सुबह माँग लिया…,
कभी शाम माँग लिया।
मोम के धागे सा पिघलता ये वक्त, जब ठंढी बयार सा लगता था,
उन पलों में लिपटी हर कड़वी मीठी बातों को अपनी स्याही में बाँध लिया;
इल्ज़ाम मुझपे लगाया नाजायज़.!
जो बहक ना जाता, तो फिर ग़ैरत-ए-इंसान था।
अब मंदिर मस्जिद तक क्या जाना?
सुकून इन पलों के सजदे में शाश्वत श्वेत है,
जैसे सिमट गए हैं इनमे नूरानी ख़्वाब सारे,
इन आँखों में मैंने वो याद,












