Saturday, August 2, 2025

अजीत-यश

पता था ना श्री राम तो आयेंगे,
फिर क्या रावण को रोकने से जटायु पीछे हट जायेंगे?

क्यों भला केवट सी जान, ख़ुद खेवनहार के खेवैया बन जाएँगे?
फिर एक संजीवनी की ख़ातिर, हनुमान पूरा सुषेण उड़ा ले जायेंगे।

कभी राजकुल के गुरु की खातिर, एकलव्य अंगूठा न्यूँछावर कर जाएँगे!
और कहीं अर्जुन के रहते, क्यों अभिमन्यु ‘चक्रव्यूह’ भेदने जाएँगे ?
कृष्ण सुदामा की दोस्ती सरस ज्ञात - ख्यात है, 
दुर्योधन - कर्ण की कैसे भूल जाएँगे!?

स्थापित है युगों से हार से पृथक, सदा प्रयास की यशगाथा है;
सच और सही से अक्षुण्ण ‘साथ’ भी पूजे जाएँगे ।

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