कश्मकश इन आंसुओं की क्या बताऊँ तुम्हें,
बड़ी शिद्दत से पलकों पीछे ख़ुद को समेटे हैं।
दहलीज़ लांघ कर आँखों से छलकना है इन्हें.!
बेख़ौफ़ ऐसा कर सकें,
अभी इतने ख़ुशक़िस्मत आज़ाद कहाँ हैं ये.॥
A tweety of desire blossoms in each heart... only few grow their wings strong enough to make a flight in veracity.
जीवन के मझधार में, सपनों का हिसाब कर रहा हूँ,
हताश हूँ के कुछ खो दिया है और कुछ बँट सा गया हूँ ॥
कभी जज़्बात में तो कभी हालात में,
कभी साज में तो कभी अल्फ़ाज़ में,
कभी अंजाम में तो कभी आगाज में,
कभी शाम में तो कभी पैग़ाम में..!
अंबर की छाँव में धरा की तपिश पर चरणचर, रात की परवाह से प्रभात की उम्मीद तक,
कुछ बँट सा गया हूँ ॥