अभी एक पहर की ही बात है,
जो कुछ देर पहले यहाँ ठहरी थी
वो सलोनी श्यामल, लंबी रात थी...
थक कर मूँदी थी आँखें जब,
उसे सुकून का आँचल ओढ़ाती,
वो ग़म जो दिन में दिलों पे दाँत गड़ाए थे,
अब भर आए थे आँखों में पानी सरीखे ;
जिसे दिन में पलकों पीछे छुपाया था - रात की आग़ोश में सैलाब आज़ाद थी।
फिसलती हुई चाँदनी से छींटकती हुई रोशनी - एक किस्सा सुना रही थी,
झाँक कर देखा जब मन के ‘झिझक’ ने…
भोर, रिवायतों की चादर ओढ़े,
चौखट सजा रही थी;
अरे.! अभी अभी तो मैं ख़ुद से मिला था - रात के आईने में,
जब अंधेरे का सच हर साये से आजाद था |
मिलन रास ना आई सफेदपोश फरेबी को.!
जो सच से ज़्यादा सलीका - पाबंद थी।
धुंधलकी लालिमा से भोर साजिश रचा रही थी,
वो जो दिन का ‘नक़ाब’ था - उस नक़ाब को अमली जामा पहना रही थी,
मेरे ‘मैं’ की वेदना को डरा रही थी;
या यूँ कह दूँ..!
कि सैलाबों की आज़ादी पे...
...अंकुश लगा रही थी?



