Saturday, December 27, 2025

भोर का नक़ाब


अभी एक पहर की ही बात है, 
जो कुछ देर पहले यहाँ ठहरी थी वो सलोनी श्यामल, लंबी रात थी...

थक कर मूँदी थी आँखें जब, उसे सुकून का आँचल ओढ़ाती, 
वो ग़म जो दिन में दिलों पे दाँत गड़ाए थे, 
अब भर आए थे आँखों में पानी सरीखे ;
जिसे दिन में पलकों पीछे छुपाया था - रात की आग़ोश में सैलाब आज़ाद थी।

फिसलती हुई चाँदनी से छींटकती हुई रोशनी - एक किस्सा सुना रही थी, 
झाँक कर देखा जब मन के ‘झिझक’ ने… 
भोर, रिवायतों की चादर ओढ़े,
चौखट सजा रही थी;
 
अरे.! अभी अभी तो मैं ख़ुद से मिला था - रात के आईने में,
जब अंधेरे का सच हर साये से आजाद था |

मिलन रास ना आई सफेदपोश फरेबी को.!
जो सच से ज़्यादा सलीका - पाबंद थी।
धुंधलकी लालिमा से भोर साजिश रचा रही थी,  
वो जो  दिन का ‘नक़ाब’ था - उस नक़ाब को अमली जामा पहना रही थी, 
मेरे ‘मैं’ की वेदना को डरा रही थी;

या यूँ कह दूँ..! 
कि सैलाबों की आज़ादी पे...
...अंकुश लगा रही थी?

तस्वीर की दुकान


जहाँ दर्द की शक़्ल नहीं होती.., 
                    तस्वीर होती है;
वहाँ एक कलाकार होता है..,
      फिर उसकी दुकान होती है ||

स्वाभिमान

मुफ़लिसी में मुस्कुराना अच्छा,  
मालदारी में मुकर जाना अच्छा;

खुशियों में रहबर शरीक आप हो जाएँगे,
गम के मौसम में गुनगुनाना अच्छा;
आग और राख में फर्क है समर्पण का,  
जो ख़ुदी पे आ जाए — अकड़ जाना अच्छा।

कभी तल्ख़ी में अपनायत मिल जाये,
फिर उसमे मीठा ढूँढ लेना अच्छा;  
और जब ज़ख्म दिल से बोल उठें —  
तो बेशक, बेस्वादी से फ़ाँका अच्छा।