Saturday, December 27, 2025

स्वाभिमान

मुफ़लिसी में मुस्कुराना अच्छा,  
मालदारी में मुकर जाना अच्छा;

खुशियों में रहबर शरीक आप हो जाएँगे,
गम के मौसम में गुनगुनाना अच्छा;
आग और राख में फर्क है समर्पण का,  
जो ख़ुदी पे आ जाए — अकड़ जाना अच्छा।

कभी तल्ख़ी में अपनायत मिल जाये,
फिर उसमे मीठा ढूँढ लेना अच्छा;  
और जब ज़ख्म दिल से बोल उठें —  
तो बेशक, बेस्वादी से फ़ाँका अच्छा।

No comments:

Post a Comment