मुफ़लिसी में मुस्कुराना अच्छा,
मालदारी में मुकर जाना अच्छा;
खुशियों में रहबर शरीक आप हो जाएँगे,
गम के मौसम में गुनगुनाना अच्छा;
आग और राख में फर्क है समर्पण का,
जो ख़ुदी पे आ जाए — अकड़ जाना अच्छा।
जो ख़ुदी पे आ जाए — अकड़ जाना अच्छा।
कभी तल्ख़ी में अपनायत मिल जाये,
फिर उसमे मीठा ढूँढ लेना अच्छा;
और जब ज़ख्म दिल से बोल उठें —
तो बेशक, बेस्वादी से फ़ाँका अच्छा।


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