रक़ीब का सहारा लेकर तू कान्हा को भूल जाती अगर,
राधा संग मीरा.. दोनो की होती कोई और डगर।
राधा संग मीरा.. दोनो की होती कोई और डगर।
ऐसा प्रेम किसने निभाया होगा..!
कृष्णधर्म के आड़े क्या स्वार्थ कभी आया होगा..?
प्रेम की पूजारण राधा ने क्या हक नही जताया होगा?
क्या दर्श पाने को मीरा का मन नही झुंझलाया होगा?
क्या दर्श पाने को मीरा का मन नही झुंझलाया होगा?
हाँ, यही सच्चे प्रेम की रवानी है...
एक भरोसेमंद उम्मीद में दोनो दीवानी हैं..!
एक भरोसेमंद उम्मीद में दोनो दीवानी हैं..!
ना प्रेम झूठा ना कृष्ण झूठा,
समझ कर इसे जीवन अपना;
प्रेम की आस में राधा और दर्श की आस में मीरा...
...हो गई अमर।
