Jalebi बालूशाही….
कोशिशों के रास्ते से ज़राहटकर मिलो,
कभी फ़ुर्सत के चौराहे पे चाय पर मिलो।
कितनी परवाह है तुम्हें अपने नाम की,
आओ, कभी अनाम-अनजान ही मिलो।
भागते-भागते बड़ी दूर निकल आए हो,
रुको, ठहरो… ज़रा ठिठक जाओ।
एक पड़ाव पीछे आओ—कोई छूट गया है,
अरे, कभी ख़ुद से तो मिलो।
आओ, उसी नुक्कड़ पे जलेबी-बालूशाही खाते हैं,
लकड़ी के स्टम्प भूलो, ईंटों की विकेट बनाते हैं।
कुछ अधपके रिश्तों की फिर दावत लगाते हैं,
जो बातों में रह गए थे, उन्हें आज निभाते हैं।
एक दिन कुछ सिक्के कम कमाते हैं,
बहुत हिसाब कर लिया नफ़े-नुक़सान का—
आओ… ज़िंदगी कमाते हैं।
