Saturday, October 12, 2024

वक्त का Fitoor...

जब ख़्वाब  से था जुड़ा, वो भी एक वक़्त था,
जो वक़्त ने है छीन लिया, वो भी तो वक़्त था !

फिर वो भी एक वक़्त था जब वक़्त की ज़ुबान फ़ितूर थी:
एक अश्क़ था - एक मोहब्बत थी,
एक प्यार था, एक नज़्म थी,
एक इश्क़ था - एक तुम थे,
एक सच था और एक हम थे..!

Sunday, August 25, 2024

हार - जीत


तिजोरी छोड़ रिश्तों की गाँव में, हम सिक्कों की बाज़ी खेलने शहर आ गये,

जहाँ कोशिशों में जीत थी, हम उम्मीदों से हार गये…

सौदा सादा था,

और वो सब मुझसे जीत गये जो घर छोड़ के नहीं गये ।।

Saturday, August 10, 2024

छाया रंग

 

फूंक फूंक रखते नन्हें कदम, जैसे हर साँस है सहमा,
वहम जाने यह कैसे पनपा.?
फिर है नफ़रतों का बादल गहराया, 

फिर हुआ है हिंसा का आलिंगन..
है सतह स्याह रक्तचरित..,
क्या चाहता है बन्दे, और क्या माँगता अब तेरा मन?

हुआ तेरा अंचल चाँदनी, या मेरा सतरंगी; 
हरित, सफ़ेद या सुर्ख़ केसरी, 
मानो इनसे ही महाभारत रचायी।

दिया जहां दावक़ी ने निर्मल गलियारा, अब वहाँ सीमाओं का बेड़ा, 

है क़रीब जैसे गंगा का आँगन, कब हिन्द ने चाहा कोई अलग वतन?
....
अब है यक़ीन की इंतहान..
सजायाफ़्ता होगी इंसानियत., या हो जाएगा सुदूर अमन..!
छाया में मज़हब छुपायी, रंगों को ये कैसी पहचान बतायी.?

Tuesday, July 16, 2024

टपकती बूँदें

 

कभी गर्म चाय की प्याली में, 
बारिश की शीतल बूँदों को टपकते देखा है?
…
प्यार और ग़ुस्से में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है उसके…
कभी ग़ुस्से से डाँटते वक़्त माँ को रोते देखा है..!


Thursday, June 6, 2024

मिट्टी का घर..

 


सूनी दिखाती है चाँदी की चौखट तुम्हारी,
गाँव की यारियाँ गँवा कर क्या सिर्फ़ रुपया ही कमाया है?

ख़ैर… 
सूनापन सताये तो बाअदब इस पार आ जाना,
पुराने क़िस्सों - कहकहों का हिस्सा, इसी शाम बन जाना।
भेंट, रोष और गुमान की क्या दरकार, तुम दिलख़ुश बेतकल्लुफ़ आना,
मैंने मेरा आशियाना दोस्ती के रंग से सजाया है ।।

खुश हूँ के कहीं मंज़िल को छोड़ कर और कभी नाकामियों से लड़ कर,
शहर की गलियों में, गाँव की मिट्टी से एक घर बनाया है।।

Wednesday, May 1, 2024

धुआँ..!


वो कश तुम्हारी थी, 

उड़ गया जो धुआँ हमारा हुआ;

इस इश्क़ का इखलाक तुम्हारा था, 

और.., ये इत्तेफाक हमारा हुआ ।