Friday, March 21, 2025

सुकून

कल ज़िंदगी से कुछ पल सुकून के उधार माँग लिया,
कभी बिछड़ चुके रिश्तों से अपना एक दोस्त भी साथ माँग लिया।

वो कुछ पल मेरे बयाने में एक शाम की थी,
तब अलसाये चाँद से गोधूलि को गुजरते पलों में एक जाम माँग लिया।
ये उन यादों, तक़रीरों, बंदिशों,
      … अल्फ़ाज़ों, शब्दों, लम्हों…
 में उलझे मेरे जज़्बात की कहानी है,
जहाँ तकल्लुफ़ सी साँसों में बची खुची ज़िंदगी को…
                                   …कभी सुबह माँग लिया…,
                                       कभी शाम माँग लिया।
मोम के धागे सा पिघलता ये वक्त, जब ठंढी बयार सा लगता था,
उन पलों में लिपटी हर कड़वी मीठी बातों को अपनी स्याही में बाँध लिया;

अब सुरूर थोड़ा जाम का… 
                                 … और ज़्यादा यारी का था,
इल्ज़ाम मुझपे लगाया नाजायज़.!
वो ख़िज़ाँ बसंती पलों का अर्श सा…
                  जो बहक ना जाता, तो फिर ग़ैरत-ए-इंसान था।

अब मंदिर मस्जिद तक क्या जाना?
सुकून इन पलों के सजदे में शाश्वत श्वेत है,
जैसे सिमट गए हैं इनमे नूरानी ख़्वाब सारे,
इन आँखों में मैंने वो याद, 
                       वो एहसास,
                        वो तेरा भाव भर लिया ॥