मेरी चाहत है कि मैं अपने आज से कुछ पिछड़ जाऊँ,
अपनी यादों के आशियाने में कुछ लम्हे पीछे चला जाऊँ।
अपनी यादों के आशियाने में कुछ लम्हे पीछे चला जाऊँ।
रह गई थी कुछ चाहतें वहाँ अधूरी..
जहां उम्मीदों में मचलती मोहब्बत नाकाम थी,
कम थे रुपये पर ज़िंदगी आसान थी !
थोड़ी मोहलत दे दो मेरे आज से, बीते कल में उन्हें वहीं जी आऊँ॥
जहां उम्मीदों में मचलती मोहब्बत नाकाम थी,
कम थे रुपये पर ज़िंदगी आसान थी !
थोड़ी मोहलत दे दो मेरे आज से, बीते कल में उन्हें वहीं जी आऊँ॥
…
कुछ रह गई है यारी की उधारी, नुक्कड़ चाय पे उसे सुलटा आऊँ।


