ये मंज़र हम कभी सोच ही न पाए,कब तू इतना दूर हो गया…
दर्द से समझौता, फिर दर्द में सुकून…अब, जैसे फ़ितूर हो गया ।।
कहीं प्यार अधूरा है,कहीं ज़िंदगी थकी हुई…कोई रुकना चाहता है,कोई हँसना चाहता है…पर हम सब भाग रहे हैं…
वो दर्द जो दिखाया नहीं जाता,वो दर्द जो महसूस होता है…इतनी भीड़ में भी, जानेये ग़म कहाँ गुम होता है…?
ज़रूरत भर का पा लिया हैफिर भी भाग रहे हैंएक अनकही ख़्वाहिश के लिए,किसी अनजानी फ़रमाइश के लिए…
ये मंज़र हम कभी सोच ही न पाए,
कब तू इतना दूर हो गया…
दर्द से समझौता,
फिर दर्द में सुकून…
अब, जैसे फ़ितूर हो गया ।।
कहीं प्यार अधूरा है,
कहीं ज़िंदगी थकी हुई…
कोई रुकना चाहता है,
कोई हँसना चाहता है…
पर हम सब भाग रहे हैं…
वो दर्द जो दिखाया नहीं जाता,
वो दर्द जो महसूस होता है…
इतनी भीड़ में भी, जाने
ये ग़म कहाँ गुम होता है…?
ज़रूरत भर का पा लिया है
फिर भी भाग रहे हैं
एक अनकही ख़्वाहिश के लिए,
किसी अनजानी फ़रमाइश के लिए…
