Saturday, February 8, 2025

तेरे मेरे पल


मेरी बैसाखी में तेरा आना और होली में गुनगुनाना,
कभी बिन सावन हरी चुनरियाँ लहराना,
फागुन तीज के झूले, जैसे भादों की फुहारें नहाना..
और पूस में सर्द sweater से आधी हथेली निकाल bye Papa कह जाना;
………….
कैसे बताऊँ मेरी हर साँस में सिमटीं हैं कुछ यादें..
 जो हक़ीक़त थीं कल;
कोई समझे तो समझे मुझे फ़क़ीर,
 मेरी बेशुमार दौलत है तेरे-मेरे वो पल…!

सुकून


 

… और फिर इस बात का सुकून था,

तेरा हाथ बेशक साथ नहीं, पर तू ख़ुद हर पल साथ था।


Saturday, February 1, 2025

बूँदें

 

मेरे वजूद के ग़ुरूर ने कभी उसको मशहूर नहीं देखा है,
है फ़ख़्र उसे, उसने उम्र भर अपना घर भरपूर देखा है।
किस्सा कौन लिखे इन हालात का.!
क्या कभी किसी की इल्मियत को इतना मजबूर देखा है.?


हाँ..! घर पुराना है मेरा, अक्सर छत टपक जाती है।
कभी गर्म चाय की प्याली में, 
उस छत से छलकती बारिश की बूँदों को टपकते देखा है?

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अब ठीक से देख नहीं पाती, पर एहसास से चमक जाती हैं, 
उन आँखों को कभी स्वतः भीगते देखा है?
ज़्यादा फ़र्क़ करना आता नहीं उसे प्यार और रोष में..
कभी बहुत ग़ुस्से में डाँटते हुए माँ को रोते देखा है?