फूंक फूंक रखते नन्हें कदम, जैसे हर साँस है सहमा,
वहम जाने यह कैसे पनपा.?
फिर है नफ़रतों का बादल गहराया,
फिर हुआ है हिंसा का आलिंगन..
है सतह स्याह रक्तचरित..,
क्या चाहता है बन्दे, और क्या माँगता अब तेरा मन?
हुआ तेरा अंचल चाँदनी, या मेरा सतरंगी;
हरित, सफ़ेद या सुर्ख़ केसरी,
मानो इनसे ही महाभारत रचायी।
हरित, सफ़ेद या सुर्ख़ केसरी,
मानो इनसे ही महाभारत रचायी।
दिया जहां दावक़ी ने निर्मल गलियारा, अब वहाँ सीमाओं का बेड़ा,
है क़रीब जैसे गंगा का आँगन, कब हिन्द ने चाहा कोई अलग वतन?
....
अब है यक़ीन की इंतहान..
सजायाफ़्ता होगी इंसानियत., या हो जाएगा सुदूर अमन..!
छाया में मज़हब छुपायी, रंगों को ये कैसी पहचान बतायी.?
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अब है यक़ीन की इंतहान..
सजायाफ़्ता होगी इंसानियत., या हो जाएगा सुदूर अमन..!
छाया में मज़हब छुपायी, रंगों को ये कैसी पहचान बतायी.?


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