जीवन के मझधार में, सपनों का हिसाब कर रहा हूँ,
हताश हूँ के कुछ खो दिया है और कुछ बँट सा गया हूँ ॥
कभी जज़्बात में तो कभी हालात में,
कभी साज में तो कभी अल्फ़ाज़ में,
कभी अंजाम में तो कभी आगाज में,
कभी शाम में तो कभी पैग़ाम में..!
अंबर की छाँव में धरा की तपिश पर चरणचर, रात की परवाह से प्रभात की उम्मीद तक,
कुछ बँट सा गया हूँ ॥

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