Saturday, April 30, 2022

पाज़ेब.!

​ना सिर्फ गहना, ना स्वर्ण, अभिमान है पाजेब । 

हो भाव का अभाव तो संवाद है पाजेब, 

कभी ममता की आवाज  कभी रसिया की पुकार है पाजेब।


देखो सूरज ढल गया क्या ..!

 अब चाँदनी सन्नाटे में विवाद है पाजेब । 

बन रहा है पकवान आज मेरे स्वाद का, 

खुशबू से पहले जो आ पहुंची, वो खनक है माँ की पाजेब ।


कल विदा किया था पापा ने लाडली को तब से घर में चुप्पी छायी है.!

आज वापस कुछ पहचाना शोर है, जाने क्या हलचल है.?

अरें देखो तो सही, जमाई संग दीदी और साथ खनकती उसकी पाजेब आई है।

जाने क्यों है कहलाती आभूषण ये, मिरे प्यार का खजाना है पाजेब.!


होती होंगी बातें चाँद तारे की तोहफे में, 

माशूक़ा से जो पुद्दा मैंने, उसकी तो जान है पाजेब।

नहीं! ऐसा कतयी नहीं की चाँद से नाराज है वो,

 पर उसके पहले करवे का तोहफा है पाजेब.।


बेशक है उत्सव त्यौहार की शान शहनाई,

पर हर दिन जो घर में संगीत सुनाए, वो है पाजेब । 

जो अब काई पूछे के गहना हे या आभूषण, 

बस कहना के दिल की जुबान हैं पाजेब |


~ निशीत



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