Sunday, July 27, 2025

बचपन दोबारा!

 मेरे हद में किस्से थोड़े बे-हद हैं..
खिलौनों में खिलता हूँ, मैं मेलों में भटकता हूँ;
सूरज से भीगता हूँ, मैं बारिशों में चमकता हूँ ॥
बेपरवाह हो सकता हूँ, बदमिजाज नहीं;
कुछ रह जाती हैं ख़्वाहिशें अधूरी…
मैं बस अपने हिस्से का बचपन जी रहा हूँ .! 

 


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