तमाशा ग़ैर जरूरी था, इस नाम अनाम का;
परवाह नहीं था,
मैं तेरी आशिक़ी, या तेरे आशिक़ का रक़ीब.!
परवाह नहीं था,
मैं तेरी आशिक़ी, या तेरे आशिक़ का रक़ीब.!
तू झेलम की धार तर्रार, मैं संग शिकारा,
देख तुझे, पर पा ना सका,
मैं इक पल जीता, मैं हर पल हारा ।
है जितनी दूरी अपनी, उतना तेरा इश्क़ क़रीब;
जे तू मेरी इबादत, ते मैं तेरा रहबीर ।
तू ही तो आप ‘तू’, है तू ही तस्वीर;
मेरे हर गीत में बस तू ही शुमार,
तू कभी शाह बुल्ले, कभी तू ‘आप’ कबीर।


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