Saturday, June 7, 2025

दूरियाँ ..

पैगाम कहां इश्क़ से बे-ताहरूफ होता है,
और अंजाम कहाँ सभी को माशूक़ होता है?
बहुत हुआ तो हुआ यूं कि...
कहीं एतबार हो जाता है, कभी एहसास रह जाता है।

किस्सा है इम्तहान का मेरे ऊँस का अक़ीदत से,
तब हसरतों की शाम में इत्तेफाक़ ने ख़ुद को,
                               ‘ख़ुद’ से मिलाया था,
तेरी मेरी मोहब्बत का अश्क़ भी हमारा था, 
                          …अश्फ़ाक भी हमारा था।

.. अब सोचता हूं तुझे तो सिमटती है चांदनी मेरी,
तुझसे दूरियों में शाम.., शमशान सा नजर आता है।

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