Sunday, September 14, 2025

धूप - रजाई

वक़्त की रज़ाई से कुछ धागे उधेड़ दो,
यादों की धूप अब सन्दली-सी ठहरने लगी है...
उसे खुलकर बरस जाने दो।
हर सूत में एक दास्तान है, हर गाँठ कोई पहचान है;
...अनचाहे हादसों की सरगम, कोई मुस्कुराते किस्सों की जान है।
सिलवटें हैं बिखरी फ़ैली हुई...
कुछ नादानियों की, कुछ अमीट—अधूरे इंतज़ारों की।
दिल कहता है— उड़ जाने दो,
... वक़्त कहता है ठहर जाने दो.!

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