जाके रथ हनुमान विराजे,
जाको सूत स्वयं जगन्नाथ संभाले,
था वो इन्द्र-बल संग अर्जुन अनुपम |
फिर भी थर्राया कुरुक्षेत्र तमाम,
जब रण में कर्ण-पार्थ का हुआ संग्राम।
कवच गया, कुंडल भी दान हुए,
फिर भी उसके प्रण महान हुए;
मित्र-धर्म का बना अभिमान,
जो मृत्यु-द्वार से भी न घबराए...
था सूत-पुत्र,
वो कुंती-पुत्र,
वो सूर्य-पुत्र महान,
जिसे हराने को स्वयं नारायण ने,
रची नीति और विधान।
Sunday, May 10, 2026
राधेय कर्ण..
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