Thursday, March 19, 2026

सपनों सी शिकारा


इन नहरों की लहरों में,
चाँदनी और दोपहरों में,
...हर शाम बहकती,
हर सुबह सँभलती— शिकारा।

इन्हीं पानी की गलियों में,
झूमते पेड़ों, शाखों और टहनियों से,
सूखे पत्तों से, गिरते फूलों से,
चहकती बेलों से, अधपके फलों से,
ठिठकती, टकराती, चप्पू चलाती — शिकारा।
बरसती मौसमी बौछारों में,
बलखाती, इठलाती — शिकारा।

हैं कहीं सैलानी बेशुमार,
…कहीं चार यार सवार,
झील हो कश्मीर की या अलेप्पी , 
रोज़गार और प्यार शिकारा॥

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