पता था न—श्रीराम तो आएँगे,
फिर क्या रावण को रोकने से जटायु पीछे हट जाएँगे?
फिर क्या रावण को रोकने से जटायु पीछे हट जाएँगे?
सोचो—क्यों भला केवट-सी जान,
ख़ुद खेवनहार का खेवैया बन जाएँगे?
क्यों शबरी की तप-प्रतीक्षा की खातिर,
भगवान जूठन खा जाएँगे?
“अंत” ज्ञात होकर भी—
कुंभकर्ण श्रीराम से लड़ जाएँगे;
भाई के लिए मृत्यु स्वीकार—पर विभीषण न बन पाएँगे.!
कभी राजकुल के गुरु की खातिर,
एकलव्य अपना अंगूठा क्यों न्यौछावर कर जाएँगे?
और कृष्ण-अर्जुन के रहते—
अभिमन्यु चक्रव्यूह में उतर जाएँगे?
यह जानते हुए भी कि दाँव खिलाफ़ है—
कर्ण कवच-कुंडल दान क्यों कर जाएँगे?
और बस संजीवनी की ख़ातिर,
हनुमान पूरा पर्वत उठा क्यों लाएँगे?
ऐसा तो हरगिज़ नहीं कि उन्हें परिणाम का अंदाज़ न था—
पर बिन संघर्ष जो नाम बनाए, इतिहास में ऐसा कोई खास न था!


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