Sunday, July 5, 2026

सुकून से जुनून तक.

चल, आज कुछ और चल लें, 
सोने को है रात पड़ी, देर साँझ कुछ और रच लें।

चल, अब हसरतों को सुकून से चुनते हैं, 
फिर सुकून से जुनून को चुनते हैं |

जो थक गए हैं ख़्वाब, उन्हें बाँहों में भर लें, 
जो टूट गए हैं रास्ते, उन्हें फिर से संवार लें;
ना मंज़िल की जल्दी, ना ठहरने का रंज, 
इन खामोशियों से भी कुछ बातें कर लें |

चल, आज कुछ और चल लें, 
आलस की इस छाँव में, ज़िंदगी की धूप को चुनते हैं,
चल, फिर सुकून से जुनून को चुनते हैं |

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