ख़्वाबों की स्याही थी, आँखों का कलम,
देखता रह गया ख़ामोश तुझे,
पर आवाज़ तुझे… मैंने दी ही नहीं;
इज़हार-ए-बयान का सवाल कहाँ,
इस इश्क़ को तेरी उम्मीद, मैंने कभी दी ही नहीं।
इल्म था अर्श के सितारे का,
मुझे मेरी ज़मीन पर;
तुझसे मिलने की ख़्वाहिश — ‘तुझसे’ तो मैंने की भी नहीं।
अब तारे भी हो चले हैं रुख़्सत,
क्या मैं चाँदनी का हाथ थाम लूँ..?
तेरी यादों में घुल जाऊँ…
या अपनी साँसों से ये रात माँग लूँ..?
लो मूँद ली अब आँखें इस ख़याल से,
जो रात इतनी हसीं थी — उसे सुबह से क्यों बाँट लूँ.!



