Wednesday, October 22, 2025

वो रात जो सुबह से बाँटी नहीं

 ख़्वाबों की स्याही थी, आँखों का कलम,
देखता रह गया ख़ामोश तुझे,
पर आवाज़ तुझे… मैंने दी ही नहीं; 
 
इज़हार-ए-बयान का सवाल कहाँ,
इस इश्क़ को तेरी उम्मीद, मैंने कभी दी ही नहीं।

इल्म था अर्श के सितारे का,
मुझे मेरी ज़मीन पर;
तुझसे मिलने की ख़्वाहिश — ‘तुझसे’ तो मैंने की भी नहीं।

अब तारे भी हो चले हैं रुख़्सत,
क्या मैं चाँदनी का हाथ थाम लूँ..?
तेरी यादों में घुल जाऊँ…
या अपनी साँसों से ये रात माँग लूँ..?

लो मूँद ली अब आँखें इस ख़याल से,
जो रात इतनी हसीं थी — उसे सुबह से क्यों बाँट लूँ.!

Sunday, September 14, 2025

धूप - रजाई

वक़्त की रज़ाई से कुछ धागे उधेड़ दो,
यादों की धूप अब सन्दली-सी ठहरने लगी है...
उसे खुलकर बरस जाने दो।
हर सूत में एक दास्तान है, हर गाँठ कोई पहचान है;
...अनचाहे हादसों की सरगम, कोई मुस्कुराते किस्सों की जान है।
सिलवटें हैं बिखरी फ़ैली हुई...
कुछ नादानियों की, कुछ अमीट—अधूरे इंतज़ारों की।
दिल कहता है— उड़ जाने दो,
... वक़्त कहता है ठहर जाने दो.!

Friday, September 5, 2025

बचपन

जिस मोड़ पर तू मुझसे छूटा,
वहाँ खड़ी मेरी फ़रेब जवानी थी…
पर जब तूने मुझे छोड़ा—
क्या तेरी मजबूरी थी?
तेरी क्या कहानी थी?

चल, जो बीत गई सो बात गई…
बस उस वक़्त का हिसाब करा दे।
एक बरस लौट के आ,
ज़िन्दगी फिर से दिलबाग़ बना दे।
रह गई हैं अधूरी बचपन की कुछ यादें, 
आ, उन्हें पूरी करा दे—

एक बार फिर गर्मी की छुट्टी दिला दे,
दोस्तों से ध्रुव और राज की कॉमिक्स दिला दे,
एक बार ही सही,
Ludo में दीदी से जीता दे।
दादी के हाथ से लड्डू बनवा दे,
नानी की गली में कुल्फ़ी वाले को बुला दे,
मम्मी से फ्रीज में Mango ice cream बनवा दे,
पापा की Vespa पे आगे खड़ा हूँ-
-चल, थोड़ा शहर घुमा दे।


मेरे मासूम से बचपन में, ‘वक़्त’ ने 'उम्र' को जोड़ दिया…
इतनी भी क्या नाराज़गी तेरी—ए बचपन!
तूने मुड़ कर देखना ही छोड़ दिया…!

Saturday, August 2, 2025

अजीत-यश

पता था ना श्री राम तो आयेंगे,
फिर क्या रावण को रोकने से जटायु पीछे हट जायेंगे?

क्यों भला केवट सी जान, ख़ुद खेवनहार के खेवैया बन जाएँगे?
फिर एक संजीवनी की ख़ातिर, हनुमान पूरा सुषेण उड़ा ले जायेंगे।

कभी राजकुल के गुरु की खातिर, एकलव्य अंगूठा न्यूँछावर कर जाएँगे!
और कहीं अर्जुन के रहते, क्यों अभिमन्यु ‘चक्रव्यूह’ भेदने जाएँगे ?
कृष्ण सुदामा की दोस्ती सरस ज्ञात - ख्यात है, 
दुर्योधन - कर्ण की कैसे भूल जाएँगे!?

स्थापित है युगों से हार से पृथक, सदा प्रयास की यशगाथा है;
सच और सही से अक्षुण्ण ‘साथ’ भी पूजे जाएँगे ।

Sunday, July 27, 2025

बचपन दोबारा!

 मेरे हद में किस्से थोड़े बे-हद हैं..
खिलौनों में खिलता हूँ, मैं मेलों में भटकता हूँ;
सूरज से भीगता हूँ, मैं बारिशों में चमकता हूँ ॥
बेपरवाह हो सकता हूँ, बदमिजाज नहीं;
कुछ रह जाती हैं ख़्वाहिशें अधूरी…
मैं बस अपने हिस्से का बचपन जी रहा हूँ .! 

 


Saturday, July 5, 2025

अनाम


तमाशा ग़ैर जरूरी था, इस नाम अनाम का;   
परवाह नहीं था,
मैं तेरी आशिक़ी, या तेरे आशिक़ का रक़ीब.!  

तू झेलम की धार तर्रार, मैं संग शिकारा,
देख तुझे, पर पा ना सका,
मैं इक पल जीता, मैं हर पल हारा ।

है जितनी दूरी अपनी, उतना तेरा इश्क़ क़रीब;
जे तू मेरी इबादत, ते मैं तेरा रहबीर ।

तू ही तो आप ‘तू’, है तू ही तस्वीर;
मेरे हर गीत में बस तू ही शुमार,
तू कभी शाह बुल्ले, कभी तू ‘आप’ कबीर।

Saturday, June 7, 2025

दूरियाँ ..

पैगाम कहां इश्क़ से बे-ताहरूफ होता है,
और अंजाम कहाँ सभी को माशूक़ होता है?
बहुत हुआ तो हुआ यूं कि...
कहीं एतबार हो जाता है, कभी एहसास रह जाता है।

किस्सा है इम्तहान का मेरे ऊँस का अक़ीदत से,
तब हसरतों की शाम में इत्तेफाक़ ने ख़ुद को,
                               ‘ख़ुद’ से मिलाया था,
तेरी मेरी मोहब्बत का अश्क़ भी हमारा था, 
                          …अश्फ़ाक भी हमारा था।

.. अब सोचता हूं तुझे तो सिमटती है चांदनी मेरी,
तुझसे दूरियों में शाम.., शमशान सा नजर आता है।