Saturday, January 14, 2023

समझदार अल्हड़..!

​कल किसी नासमझ ने 'अल्हड़’ के आदी को समझदार कह दिया,          
मगरूर से मन में मेरे इठलाते 'मैं' का सामना 'हम' से हो गया।
जंग अच्छी थी मिजाज के जुबानों की,  
और कलम को अपना रोज़गार मिल गया ॥                              

सरकते डब्बों में ख़ुद को बंद कर लिया क्या ?
अब traffic का हिस्सा बन उसी में झल्लाये बैठे हो,
हम तो तीन यार, कैंची मार साइकिल पे सवार अच्छे थे।
‘मैं’ ने ख्वाहिशों को जरुरत ए आम बना लिया है, 
हम अंध स्पर्धा से अंजान ही अच्छे थे॥

ले लिया क्या toothpaste में नमक स्वादानुसार?
हम तो बचपन से colgate ही अच्छे थे ।
सुना है हिमालय से नामक भी गुलाबी आया है!
हम तो TATA Salt ही अच्छे थे॥

दोस्तों के नाम उपनाम में पहचान ढूँढते हो?
हम तो ‘चल बे साले’ ही अच्छे थे।
Golf, snooker सीख लिया जीतना? 
हम खो-खो, कबड्डी ही अच्छे थे ॥

देखा है google siri सुना रहे अब बच्चों को लोरियाँ, 
हमें तो नानी, दादी के क़िस्से ही अच्छे थे।
वक़्त की क़ीमत से अनजान हो अभी, लगा लो OTT सारे, 
हम तो हर इतवार ‘सुरभि’, ‘रंगोली’ ही अच्छे थे ॥

zomato swiggy ने जगह बना ली है खर्च कि खातों में,
हमें तो माँ के हाथ से २ निवाले ही अच्छे थे।
यक़ीन मानों समझदारी का ठप्पा छलावा है..!
हम नादान.., बेईमान से अच्छे थे॥

Friday, January 6, 2023

छाँव

 


ये अनंत स्याह रात सी ज़िंदगी है, सन्नाटे में शोर लपेटे हुए,
एक अरसा गुजर गया बेफ़िक्री से पलकें समेटे हुए,
अक्सर ढूँढता हूँ वो पापा कि परछाईं, 
जहां तूफ़ानों में भी नींद आ जाती थी.!


Wednesday, December 14, 2022

तू है ना.!



तू है या नहीं, जवाब बता अब कहाँ से लाऊँ… !?

जो किया तूने इशारा भी जवाब का, मैं ख़ुद से जीत जाऊँ ।

कहाँ करूँ तुझे तलाश, तेरे अक्स का पता नहीं।

बस इतना है पहचाना के तू है अनंत, तू ही है अंत भी ॥

जो तुझे मिल जाऊँ अगर, जानें क्या क्या कर जाऊँ.!

तू बन आ जोगी मैं धूनी रमाऊँ, तू उठा डमरू मैं नग बन जाऊँ॥



Monday, October 17, 2022

दहलीज़




कश्मकश इन आंसुओं की क्या बताऊँ तुम्हें,
बड़ी शिद्दत से पलकों पीछे ख़ुद को समेटे हैं।
दहलीज़ लांघ कर आँखों से छलकना है इन्हें.!
बेख़ौफ़ ऐसा कर सकें,
अभी इतने ख़ुशक़िस्मत आज़ाद कहाँ हैं ये.॥

Sunday, October 16, 2022

ज़िम्मेदार



जीवन के मझधार में, सपनों का हिसाब कर रहा हूँ,

हताश हूँ के कुछ खो दिया है और कुछ बँट सा गया हूँ ॥

कभी जज़्बात में तो कभी हालात में,

कभी साज में तो कभी अल्फ़ाज़ में,

कभी अंजाम में तो कभी आगाज में,

कभी शाम में तो कभी पैग़ाम में..!

अंबर की छाँव में धरा की तपिश पर चरणचर, रात की परवाह से प्रभात की उम्मीद तक,

 कुछ बँट सा गया हूँ ॥

Saturday, April 30, 2022

पाज़ेब.!

​ना सिर्फ गहना, ना स्वर्ण, अभिमान है पाजेब । 

हो भाव का अभाव तो संवाद है पाजेब, 

कभी ममता की आवाज  कभी रसिया की पुकार है पाजेब।


देखो सूरज ढल गया क्या ..!

 अब चाँदनी सन्नाटे में विवाद है पाजेब । 

बन रहा है पकवान आज मेरे स्वाद का, 

खुशबू से पहले जो आ पहुंची, वो खनक है माँ की पाजेब ।


कल विदा किया था पापा ने लाडली को तब से घर में चुप्पी छायी है.!

आज वापस कुछ पहचाना शोर है, जाने क्या हलचल है.?

अरें देखो तो सही, जमाई संग दीदी और साथ खनकती उसकी पाजेब आई है।

जाने क्यों है कहलाती आभूषण ये, मिरे प्यार का खजाना है पाजेब.!


होती होंगी बातें चाँद तारे की तोहफे में, 

माशूक़ा से जो पुद्दा मैंने, उसकी तो जान है पाजेब।

नहीं! ऐसा कतयी नहीं की चाँद से नाराज है वो,

 पर उसके पहले करवे का तोहफा है पाजेब.।


बेशक है उत्सव त्यौहार की शान शहनाई,

पर हर दिन जो घर में संगीत सुनाए, वो है पाजेब । 

जो अब काई पूछे के गहना हे या आभूषण, 

बस कहना के दिल की जुबान हैं पाजेब |


~ निशीत



Saturday, January 22, 2022

राधा की उम्मीद, मीरा का भरोसा.!


रक़ीब का सहारा लेकर तू कान्हा को भूल जाती अगर, 
राधा संग मीरा.. दोनो की होती कोई और डगर।

ऐसा प्रेम किसने निभाया होगा..!
कृष्णधर्म के आड़े क्या स्वार्थ कभी आया होगा..?

प्रेम की पूजारण राधा ने क्या हक नही जताया होगा? 
क्या दर्श पाने को मीरा का मन नही झुंझलाया होगा?

हाँ, यही सच्चे प्रेम की रवानी है...
एक भरोसेमंद उम्मीद में दोनो दीवानी हैं..!

ना प्रेम झूठा ना कृष्ण झूठा, 
समझ कर इसे जीवन अपना;
प्रेम की आस में राधा और दर्श की आस में मीरा...
...हो गई अमर।