Sunday, May 10, 2026

राधेय कर्ण..

जाके रथ हनुमान विराजे, 
जाको  सूत स्वयं जगन्नाथ संभाले,
था वो इन्द्र-बल संग अर्जुन अनुपम |
फिर भी थर्राया कुरुक्षेत्र तमाम, 
जब रण में कर्ण-पार्थ का हुआ संग्राम।

कवच गया, कुंडल भी दान हुए, 
फिर भी उसके प्रण महान हुए; 
मित्र-धर्म का बना अभिमान, 
जो मृत्यु-द्वार से भी न घबराए...

था सूत-पुत्र, 
वो कुंती-पुत्र, 
वो सूर्य-पुत्र महान, 
जिसे हराने को स्वयं नारायण ने, 
रची नीति और विधान।

Thursday, March 19, 2026

सपनों सी शिकारा


इन नहरों की लहरों में,
चाँदनी और दोपहरों में,
...हर शाम बहकती,
हर सुबह सँभलती— शिकारा।

इन्हीं पानी की गलियों में,
झूमते पेड़ों, शाखों और टहनियों से,
सूखे पत्तों से, गिरते फूलों से,
चहकती बेलों से, अधपके फलों से,
ठिठकती, टकराती, चप्पू चलाती — शिकारा।
बरसती मौसमी बौछारों में,
बलखाती, इठलाती — शिकारा।

हैं कहीं सैलानी बेशुमार,
…कहीं चार यार सवार,
झील हो कश्मीर की या अलेप्पी , 
रोज़गार और प्यार शिकारा॥

प्रीत और इंतेज़ार



एक वक्त था- गुज़र गया, बेशकीमती ख़्वाब सरीखा;
 तेरे प्रीत का वो गहरा, पर अनकहा सलीका।
जा रख ले तू सुनहरी सुबह अपनी,
मेरी हिस्से ठहरी ये शाम… 

कोशिशें भी नाकाम शर्मशार, तुझसे बराबरी की;
तू मंजिल, मैं ढलान,
तू साज, मैं सामान, 
तू नज़्म, मैं जुबान;
तू बेहद खास, मैं मामूली आम ।

शिकवा भी कौन करे अब दूरियों का,
अब तेरा इंतज़ार ही मेरा सुकून, मेरा आराम॥

Thursday, January 1, 2026

परिणाम के परे - प्रयास !


पता था न—श्रीराम तो आएँगे,
फिर क्या रावण को रोकने से जटायु पीछे हट जाएँगे?

सोचो—क्यों भला केवट-सी जान,
ख़ुद खेवनहार का खेवैया बन जाएँगे?
क्यों शबरी की तप-प्रतीक्षा की खातिर,
भगवान जूठन खा जाएँगे?

“अंत” ज्ञात होकर भी—
कुंभकर्ण श्रीराम से लड़ जाएँगे;
भाई के लिए मृत्यु स्वीकार—पर विभीषण न बन पाएँगे.!

कभी राजकुल के गुरु की खातिर,
एकलव्य अपना अंगूठा क्यों न्यौछावर कर जाएँगे?
और कृष्ण-अर्जुन के रहते—
अभिमन्यु चक्रव्यूह में उतर जाएँगे?

यह जानते हुए भी कि दाँव खिलाफ़ है—
कर्ण कवच-कुंडल दान क्यों कर जाएँगे?
और बस संजीवनी की ख़ातिर,
हनुमान पूरा पर्वत उठा क्यों लाएँगे?

ऐसा तो हरगिज़ नहीं कि उन्हें परिणाम का अंदाज़ न था—
पर बिन संघर्ष जो नाम बनाए, इतिहास में ऐसा कोई खास न था!

Saturday, December 27, 2025

भोर का नक़ाब


अभी एक पहर की ही बात है, 
जो कुछ देर पहले यहाँ ठहरी थी वो सलोनी श्यामल, लंबी रात थी...

थक कर मूँदी थी आँखें जब, उसे सुकून का आँचल ओढ़ाती, 
वो ग़म जो दिन में दिलों पे दाँत गड़ाए थे, 
अब भर आए थे आँखों में पानी सरीखे ;
जिसे दिन में पलकों पीछे छुपाया था - रात की आग़ोश में सैलाब आज़ाद थी।

फिसलती हुई चाँदनी से छींटकती हुई रोशनी - एक किस्सा सुना रही थी, 
झाँक कर देखा जब मन के ‘झिझक’ ने… 
भोर, रिवायतों की चादर ओढ़े,
चौखट सजा रही थी;
 
अरे.! अभी अभी तो मैं ख़ुद से मिला था - रात के आईने में,
जब अंधेरे का सच हर साये से आजाद था |

मिलन रास ना आई सफेदपोश फरेबी को.!
जो सच से ज़्यादा सलीका - पाबंद थी।
धुंधलकी लालिमा से भोर साजिश रचा रही थी,  
वो जो  दिन का ‘नक़ाब’ था - उस नक़ाब को अमली जामा पहना रही थी, 
मेरे ‘मैं’ की वेदना को डरा रही थी;

या यूँ कह दूँ..! 
कि सैलाबों की आज़ादी पे...
...अंकुश लगा रही थी?

तस्वीर की दुकान


जहाँ दर्द की शक़्ल नहीं होती.., 
                    तस्वीर होती है;
वहाँ एक कलाकार होता है..,
      फिर उसकी दुकान होती है ||

स्वाभिमान

मुफ़लिसी में मुस्कुराना अच्छा,  
मालदारी में मुकर जाना अच्छा;

खुशियों में रहबर शरीक आप हो जाएँगे,
गम के मौसम में गुनगुनाना अच्छा;
आग और राख में फर्क है समर्पण का,  
जो ख़ुदी पे आ जाए — अकड़ जाना अच्छा।

कभी तल्ख़ी में अपनायत मिल जाये,
फिर उसमे मीठा ढूँढ लेना अच्छा;  
और जब ज़ख्म दिल से बोल उठें —  
तो बेशक, बेस्वादी से फ़ाँका अच्छा।