Saturday, June 7, 2025

दूरियाँ ..

पैगाम कहां इश्क़ से बे-ताहरूफ होता है,
और अंजाम कहाँ सभी को माशूक़ होता है?
बहुत हुआ तो हुआ यूं कि...
कहीं एतबार हो जाता है, कभी एहसास रह जाता है।

किस्सा है इम्तहान का मेरे ऊँस का अक़ीदत से,
तब हसरतों की शाम में इत्तेफाक़ ने ख़ुद को,
                               ‘ख़ुद’ से मिलाया था,
तेरी मेरी मोहब्बत का अश्क़ भी हमारा था, 
                          …अश्फ़ाक भी हमारा था।

.. अब सोचता हूं तुझे तो सिमटती है चांदनी मेरी,
तुझसे दूरियों में शाम.., शमशान सा नजर आता है।

Friday, March 21, 2025

सुकून

कल ज़िंदगी से कुछ पल सुकून के उधार माँग लिया,
कभी बिछड़ चुके रिश्तों से अपना एक दोस्त भी साथ माँग लिया।

वो कुछ पल मेरे बयाने में एक शाम की थी,
तब अलसाये चाँद से गोधूलि को गुजरते पलों में एक जाम माँग लिया।
ये उन यादों, तक़रीरों, बंदिशों,
      … अल्फ़ाज़ों, शब्दों, लम्हों…
 में उलझे मेरे जज़्बात की कहानी है,
जहाँ तकल्लुफ़ सी साँसों में बची खुची ज़िंदगी को…
                                   …कभी सुबह माँग लिया…,
                                       कभी शाम माँग लिया।
मोम के धागे सा पिघलता ये वक्त, जब ठंढी बयार सा लगता था,
उन पलों में लिपटी हर कड़वी मीठी बातों को अपनी स्याही में बाँध लिया;

अब सुरूर थोड़ा जाम का… 
                                 … और ज़्यादा यारी का था,
इल्ज़ाम मुझपे लगाया नाजायज़.!
वो ख़िज़ाँ बसंती पलों का अर्श सा…
                  जो बहक ना जाता, तो फिर ग़ैरत-ए-इंसान था।

अब मंदिर मस्जिद तक क्या जाना?
सुकून इन पलों के सजदे में शाश्वत श्वेत है,
जैसे सिमट गए हैं इनमे नूरानी ख़्वाब सारे,
इन आँखों में मैंने वो याद, 
                       वो एहसास,
                        वो तेरा भाव भर लिया ॥

Saturday, February 8, 2025

तेरे मेरे पल


मेरी बैसाखी में तेरा आना और होली में गुनगुनाना,
कभी बिन सावन हरी चुनरियाँ लहराना,
फागुन तीज के झूले, जैसे भादों की फुहारें नहाना..
और पूस में सर्द sweater से आधी हथेली निकाल bye Papa कह जाना;
………….
कैसे बताऊँ मेरी हर साँस में सिमटीं हैं कुछ यादें..
 जो हक़ीक़त थीं कल;
कोई समझे तो समझे मुझे फ़क़ीर,
 मेरी बेशुमार दौलत है तेरे-मेरे वो पल…!

सुकून


 

… और फिर इस बात का सुकून था,

तेरा हाथ बेशक साथ नहीं, पर तू ख़ुद हर पल साथ था।


Saturday, February 1, 2025

बूँदें

 

मेरे वजूद के ग़ुरूर ने कभी उसको मशहूर नहीं देखा है,
है फ़ख़्र उसे, उसने उम्र भर अपना घर भरपूर देखा है।
किस्सा कौन लिखे इन हालात का.!
क्या कभी किसी की इल्मियत को इतना मजबूर देखा है.?


हाँ..! घर पुराना है मेरा, अक्सर छत टपक जाती है।
कभी गर्म चाय की प्याली में, 
उस छत से छलकती बारिश की बूँदों को टपकते देखा है?

.
.
अब ठीक से देख नहीं पाती, पर एहसास से चमक जाती हैं, 
उन आँखों को कभी स्वतः भीगते देखा है?
ज़्यादा फ़र्क़ करना आता नहीं उसे प्यार और रोष में..
कभी बहुत ग़ुस्से में डाँटते हुए माँ को रोते देखा है?


Saturday, October 12, 2024

वक्त का Fitoor...

जब ख़्वाब  से था जुड़ा, वो भी एक वक़्त था,
जो वक़्त ने है छीन लिया, वो भी तो वक़्त था !

फिर वो भी एक वक़्त था जब वक़्त की ज़ुबान फ़ितूर थी:
एक अश्क़ था - एक मोहब्बत थी,
एक प्यार था, एक नज़्म थी,
एक इश्क़ था - एक तुम थे,
एक सच था और एक हम थे..!