Thursday, January 1, 2026

परिणाम के परे - प्रयास !


पता था न—श्रीराम तो आएँगे,
फिर क्या रावण को रोकने से जटायु पीछे हट जाएँगे?

सोचो—क्यों भला केवट-सी जान,
ख़ुद खेवनहार का खेवैया बन जाएँगे?
क्यों शबरी की तप-प्रतीक्षा की खातिर,
भगवान जूठन खा जाएँगे?

“अंत” ज्ञात होकर भी—
कुंभकर्ण श्रीराम से लड़ जाएँगे;
भाई के लिए मृत्यु स्वीकार—पर विभीषण न बन पाएँगे.!

कभी राजकुल के गुरु की खातिर,
एकलव्य अपना अंगूठा क्यों न्यौछावर कर जाएँगे?
और कृष्ण-अर्जुन के रहते—
अभिमन्यु चक्रव्यूह में उतर जाएँगे?

यह जानते हुए भी कि दाँव खिलाफ़ है—
कर्ण कवच-कुंडल दान क्यों कर जाएँगे?
और बस संजीवनी की ख़ातिर,
हनुमान पूरा पर्वत उठा क्यों लाएँगे?

ऐसा तो हरगिज़ नहीं कि उन्हें परिणाम का अंदाज़ न था—
पर बिन संघर्ष जो नाम बनाए, इतिहास में ऐसा कोई खास न था!

Saturday, December 27, 2025

भोर का नक़ाब


अभी एक पहर की ही बात है, 
जो कुछ देर पहले यहाँ ठहरी थी वो सलोनी श्यामल, लंबी रात थी...

थक कर मूँदी थी आँखें जब, उसे सुकून का आँचल ओढ़ाती, 
वो ग़म जो दिन में दिलों पे दाँत गड़ाए थे, 
अब भर आए थे आँखों में पानी सरीखे ;
जिसे दिन में पलकों पीछे छुपाया था - रात की आग़ोश में सैलाब आज़ाद थी।

फिसलती हुई चाँदनी से छींटकती हुई रोशनी - एक किस्सा सुना रही थी, 
झाँक कर देखा जब मन के ‘झिझक’ ने… 
भोर, रिवायतों की चादर ओढ़े,
चौखट सजा रही थी;
 
अरे.! अभी अभी तो मैं ख़ुद से मिला था - रात के आईने में,
जब अंधेरे का सच हर साये से आजाद था |

मिलन रास ना आई सफेदपोश फरेबी को.!
जो सच से ज़्यादा सलीका - पाबंद थी।
धुंधलकी लालिमा से भोर साजिश रचा रही थी,  
वो जो  दिन का ‘नक़ाब’ था - उस नक़ाब को अमली जामा पहना रही थी, 
मेरे ‘मैं’ की वेदना को डरा रही थी;

या यूँ कह दूँ..! 
कि सैलाबों की आज़ादी पे...
...अंकुश लगा रही थी?

तस्वीर की दुकान


जहाँ दर्द की शक़्ल नहीं होती.., 
                    तस्वीर होती है;
वहाँ एक कलाकार होता है..,
      फिर उसकी दुकान होती है ||

स्वाभिमान

मुफ़लिसी में मुस्कुराना अच्छा,  
मालदारी में मुकर जाना अच्छा;

खुशियों में रहबर शरीक आप हो जाएँगे,
गम के मौसम में गुनगुनाना अच्छा;
आग और राख में फर्क है समर्पण का,  
जो ख़ुदी पे आ जाए — अकड़ जाना अच्छा।

कभी तल्ख़ी में अपनायत मिल जाये,
फिर उसमे मीठा ढूँढ लेना अच्छा;  
और जब ज़ख्म दिल से बोल उठें —  
तो बेशक, बेस्वादी से फ़ाँका अच्छा।

Thursday, November 27, 2025

समझौते का सुकून

 ये मंज़र हम कभी सोच ही न पाए,
कब तू इतना दूर हो गया…

दर्द से समझौता, 
फिर दर्द में सुकून…
अब, जैसे फ़ितूर हो गया ।।

कहीं प्यार अधूरा है,
कहीं ज़िंदगी थकी हुई…
कोई रुकना चाहता है,
कोई हँसना चाहता है…
पर हम सब भाग रहे हैं…

वो दर्द जो दिखाया नहीं जाता,
वो दर्द जो महसूस होता है…
इतनी भीड़ में भी, जाने
ये ग़म कहाँ गुम होता है…?

ज़रूरत भर का पा लिया है
फिर भी भाग रहे हैं
एक अनकही ख़्वाहिश के लिए,
किसी अनजानी फ़रमाइश के लिए…

Wednesday, October 22, 2025

वो रात जो सुबह से बाँटी नहीं

 ख़्वाबों की स्याही थी, आँखों का कलम,
देखता रह गया ख़ामोश तुझे,
पर आवाज़ तुझे… मैंने दी ही नहीं; 
 
इज़हार-ए-बयान का सवाल कहाँ,
इस इश्क़ को तेरी उम्मीद, मैंने कभी दी ही नहीं।

इल्म था अर्श के सितारे का,
मुझे मेरी ज़मीन पर;
तुझसे मिलने की ख़्वाहिश — ‘तुझसे’ तो मैंने की भी नहीं।

अब तारे भी हो चले हैं रुख़्सत,
क्या मैं चाँदनी का हाथ थाम लूँ..?
तेरी यादों में घुल जाऊँ…
या अपनी साँसों से ये रात माँग लूँ..?

लो मूँद ली अब आँखें इस ख़याल से,
जो रात इतनी हसीं थी — उसे सुबह से क्यों बाँट लूँ.!

Sunday, September 14, 2025

धूप - रजाई

वक़्त की रज़ाई से कुछ धागे उधेड़ दो,
यादों की धूप अब सन्दली-सी ठहरने लगी है...
उसे खुलकर बरस जाने दो।
हर सूत में एक दास्तान है, हर गाँठ कोई पहचान है;
...अनचाहे हादसों की सरगम, कोई मुस्कुराते किस्सों की जान है।
सिलवटें हैं बिखरी फ़ैली हुई...
कुछ नादानियों की, कुछ अमीट—अधूरे इंतज़ारों की।
दिल कहता है— उड़ जाने दो,
... वक़्त कहता है ठहर जाने दो.!