Friday, December 8, 2023

मुखौटा

हयात की तलाश में खुशियों का हिसाब कर चुका है,
माँ की परवाह से मोहब्बत की पहचान तक,
कुछ खो चुका है, और कुछ बँट गया है।
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लड़कपन गुजर गया उसका, अब मर्द बन रहा है वो! 

कभी जज़्बात में, कभी हालात में,
कभी साज में और कभी अल्फ़ाज़ में ।
कभी अंजाम में तो कभी आग़ाज़ में,
कभी शाम में तो कभी पैग़ाम में ॥
आँचल की छाँव से, पायल की झंकार तक,
कुछ बँट सा गया है वो !

ममता की पुकार से, इश्क़ की ललकार तक,
हर पल बँटा है वो।
कभी सिंदूर की लाज में और कभी कोख के उधार में,
बस बंटता रहा है वो  !

… मर गया बचपन, गुजर गई जवानी,
अब बन गया है मर्द वो .!

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