मुझे इल्म है तेरी हर शिकायत का..
जिनसे तारूफ़ वफ़ा नहीं, वक़्त ने किया हैं,
पर ये भी रुतबा है तेरे इश्क़ का..
जिसने वक़्त की दरिया में वफ़ा बांध लिया है।
अब इसे नाकामी नहीं, इंतहान ही समझ लेना,
आशिक़ ना सही, फ़रियादी ही समझ लेना।
तू मंज़िल है अगर.!
तो तेरे रास्ते में हासिल हर मुक़ाम बेजान बियाबान नज़र आते हैं।
तू ख़्वाब है अगर.!
तो तेरे ख़्वाब-ओ-मिलन की ख़ुशबू मेरे अक्स को महकाते हैं|
हैं कोशिशें बेशुमार जो क्षितिज से एक झरोखा उधार माँग लूँ,
पर बहुत मुश्किल है उस दरार का दीदार,
जहां से रोशनी और अंधेरा समान नज़र आते हैं॥
जहां से रोशनी और अंधेरा समान नज़र आते हैं॥


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