सोच कर के क्यों राष्ट्रवाद इस कदर दुराभाव से भरमाया है,
मानसपटल पर कुछ आक्रोश समाया है इसीलिए आज हमने भी कलम उठाया है।
ना जाने अबौद्धिक ये विषधर कब हो जाते हैं, कभी तीसरे देश में जाकर खुद को ’२’ भारत का निवासी बताते हैं,
सस्ती लोकप्रियता की खातिर ये मातृभूमि का माखौल बनाते हैं,
फिर खुद को कलाकर बता कर अपना मुंह छुपाते हैं।
कलंक को कलाकर कहने पर मैं कलाकारों से क्षमा लेता हूं,
और रस विहीन उस ’हास्य’ कविता का परिचय सच्चे भारत करवाता हूं।
मैं उस हिंदुस्तान में रहता हूं जहां,
पिता की इज्जत और मां से प्यार, हम यार संसार करते हैं,
मां मेरी है या दोस्त तेरी, पैर छूने से पहले कहां सोचते हैं?
मेरी बहन की शादी में सारे दोस्त जूठे बर्तन भी बिना विकार उठाते हैं, पर २ पैकेट मैगी किस किस k हिस्से आएगी इसपे महाभारत कर जाते हैं।
”छोटी बहन क्यों हर घर में पूजी जाती है?” यह सवाल किया था मैंने, समझाया था बुजर्गों ने के कन्या देवी रूप पहचानी जाती है।
हैं कुछ दुर्जन हर समाज में पर, दिन की देवी की खातिर क्या तुम्हारी और मेरी आंखें रात में शर्महीन हो जाती हैं?
क्या यूं ही एक मीराबाई अपने पदक की जीत पर, अनजान ट्रक चालकों की सदभाव नियति से कृतज्ञ हो जाती हैं?
बच्चे की आया भी मौसी और घर की बाई दीदी कहलाती है, अरे
मैं उस हिंदुस्तान में रहता हूं, जहां भैया पिता तुल्य काया बन जाता है, और भाभी स्नेह से ’मां’ कहलाती है।
मैं उस हिंदुस्तान में रहता हूं जहां बचपन मां पिता के साथ दादा दादी, चाचा चाची, मामा मामी... अनगिनत रिश्तों ने संवारा है,
कैसे भुल जाऊं के पड़ोस की चाची ने मां की डांट से कितना बचाया है,
कितना प्यार किया है सबने, याद नही कभी किसी ने निवाला गिनाया है!
देखी है बहुत सिक्कों में तौलती मेहमाननवाजी सरायों में,
मैं उस हिन्दुस्तान में रहता हूं, जहां मेहमान में भगवान दर्शाया हैं।
९००० AQI मेरे हिंदुस्तान की हवा नही, किसी शहर का क्षणिक सूचक होगा,
मेरे हिंदुस्तान की हवाओं में कश्मीर के केसर, और केरल की इलायची का सुगंध समाया है।
उन्नति की होड़ अंधी लगी है, कुछ तो हिसाब चुकाना होगा,
जाओ ढूंढ लाओ हिसाब जहां हिंदुस्तान ने पहले ग्लेशियर पिघलाया होगा।
नीरज का भाला जब टोक्यो पर छाया, क्या धर्म क्या जात, हर जुबान बस जन गण मन ही गाया,
किसी नीली जर्सी वाले ने छक्का लगाया तो भी तिरंगा ही लहराया, किसने तिरंगे का रंग सिर्फ केसरी पाया?
हां कभी कभार घर में झगड़ा हो जाता है, पर सच बताओ की गिना है कभी के कितने धर्म का आशीर्वाद हर सुख दुख में बरस जाता है? रहीम चाचा, पीटर अंकल और सिंहजी का परिवार तो CORONA मेंभी खाना पहुंचाता है।
मैं उस हिंदुस्तान में रहता हूं जहां हॉकी, क्रिकेट के खुमार में बच्चे गिल्ली डंडा से मोहब्बत करते हैं,
हरे और केसरी की बात करते हो, हम तो इंद्रधनुष साथ रहते हैं।
है अनगिनत बातें इस देश की जिसपे मैं गुमान करता हूं,
लेखनी भी थक जाए इसकी ख्याति में जिस हिंदुस्तान में मैं रहता हूं।
बहुत छोटी है शख्शियत मेरी और हैं कुछ कमियां हैं सामाजिक हर जिक्र मानता हूं, पर मजाक जन्मभूमि का बनाऊं, इस बात पे एतराज करता हूं और अपने हैसियत से सुधार की कोशिश करता हूं।
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